कविता " बढलै जार"- जिबछ उदासी

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बढलै जार
गिरै छै ठार
गलाबै हार
लता कपडा के
जेकरा आभाव
ओकरा सभक
जीवन वेकार
प्राकृतिक प्रकोप
गरीबसभके सताबै
कतौ नइ छै जोगार …….

बढलै जार
गिरै छै ठार
घुरा ताइप के
जोगाबै जान
सम्पन्न लोकसभा
मखरै खा के पान
जकरा सम्पति
ओकरा कोन विपति
दलित गरीव के लेल
करु आब जोगार……..

बढलै जार
गिरै छै ठार
कि हेतै गरीवक मुक्ति
सब लगौ ने छै खाय के जुक्ति
एकेटा मिसन
कोना अउतै कमिसन
कहियो बाइढ बहाबै
कहियो शीतलहरी आबै
सवटा विपति
गरीवे के लेल आबै
राजनीति सेवा नइ
भगेल बेपार
बइढ गेल जार ……..

गिरै छै ठार
गलाबै हार
बृद्ध वृद्धा के जोगाउ
बौवा बुची के
गरम कपडा लगा के
विद्यालय पठाउ
चदरामुक्त बनाउ घर
जार गर्मी मे हेतै भर
गरीव वस्ती मे दियौ राहत
स्थानीय सरकार
बढलै जार
गिरै छै ठार
जीवछ उदासी
पुस २३- लहान

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